
नूरपुर (कांगड़ा)। ब्रिटिशकालीन पठानकोट-जोगिंद्रनगर रेलमार्ग के ब्रॉडगेज होने की राह में इसकी कास्ट बेनिफिट वेल्यू रोड़ा अटका रही है, जोकि पिछले सर्वेक्षण में लगभग 22 फीसदी आंकी गई थी। दरअसल, इस नैरोगेज रेलमार्ग पर सालाना करोड़ों रुपये का घाटा उठाकर रेलगाड़ियां दौड़ रही हैं। सूत्रों की मानें तो इस नैरोगेज रेलमार्ग पर लगभग 20 करोड़ रुपये सालाना घाटा उठाना पड़ रहा है। जबकि रेलवे विभाग को टिकटों से होने कमाई मात्र 3.5 से 4 करोड़ रुपये ही है। प्रदेश की प्रमुख धरोहरों में गौरवशाली इतिहास समेटे पठानकोट-जोगिंद्रनगर रेल ने दशकों लंबा सफर बिना किसी बाधा के पूरा किया है, लेकिन भविष्य में इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि इस नैरोगेज रेलमार्ग पर चल रहे जेडीएम-3 नैरोगेज मॉडल के लोकोमोटिव हाइड्रोलिक डीजल इंजन अपनी आयु सीमा पूरी कर चुके हैं। जिनका विभाग के पास फिलहाल कोई विकल्प भी नहीं है। आलम यह है कि बूढ़े इंजनों के सहारे दौड़ने वाली रेलगाड़ियां आए दिन जहां बीच रास्ते में दम तोड़ रही हैं। जसूर, तलाड़ा, जवाली, हरिपुर, नगरोटा सूरियां, कांगड़ा, ज्वालामुखी रोड, नगरोटा बगवां, पालमपुर और बैजनाथ क्षेत्रों के लिए तो घाटी की यह रेल जीवन रेखा समझी जाती है। यही नहीं कांगड़ा घाटी के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों को आने वाले लाखों श्रद्धालु भी इसी रेलमार्ग से यात्रा करते हैं। सात अप और सात डाउन रेलगाड़ियों में खासी भीड़ रहती है। बावजूद इसके पिछले आठ दशक में इस नैरोगेज रेलवे लाइन के विकास व विस्तार को लेकर रेल मंत्रालय ने कोई जहमत नहीं उठाई। हालांकि, इस ब्रिटिशकालीन रेलमार्ग के विस्तार को लेकर रेल मंत्रालय पहले सर्वेक्षण की मीठी गोली देता रहा तो कभी इसे कालका-शिमला की तर्ज पर यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिलाने का सपना दिखाया गया। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।
उधर, रेलवे अधिकारियों की मानें तो इस नैरोगेज रेलवे लाइन पर टिकटों से मिलने वाली कमाई मात्र ढाई से तीन करोड़ के बीच बैठती है। जबकि इस मार्ग पर लगभग 500 रेलवे अधिकारियों और कर्मचारियों की सालाना पगार इससे कई गुणा ज्यादा बनती है।
